कुंभनगर। यदि आपको लगता है कि महाकुंभ में देश के सुदूर क्षेत्रों से आने वाले महात्मा केवल महाकाव्यों व वैदिक परंपराओं के मर्मज्ञ हैं,तो कहीं न कहीं आपकी जानकारी अधूरी है । संगम की रेती में देश भर से आने वाली विभूतियों में ‘डा. बिन्दु जी महराज ‘‘बिन्दू’’’ ऐसे महात्मा हैं जिन्हें विविध भाषाओं के साथ ही काव्य की जापनी विधा ‘हाईकू’ भी आती है। बिन्दु जी महराज द्वारा इस विधा को अपने राज्य आन्ध्र में लोकप्रिय बनाकर ‘हिन्दू हाईकूकारों’ की एक नयी पौध तैयार कर दी गयी है जो नित नयी रचनाओं को रच कर लुप्त हुई परंपरा को पुर्नजीवित करने का कार्य कर रहे हैं।
प्राचीन भारत में काव्य की यह विधा ‘समानिका ‘छंद’ के रूप में संग्रहित थी लेकिन आक्रमणों के साथ ही यह परंपरा विदेश से आने वाले फाह्यान व ह्वेनसांग जैसे बौद्ध भिक्षुओं द्वारा ले जाये गये साहित्य के साथ विदेशों में चली गयी और भारत से विलुप्तप्राय हो गयी। काव्य की यह विधा किसी प्रकार से जापान पहुंच गयी जहां कवि ‘झेन’ ने इस विधा का नाम जापानी में ‘ हाईकू’ कर दिया। जापान में हाईकू को ‘वन ब्रीथ पोयम’(एक स्वांसी काव्य) कहा गया। इस विधा में प्रकृति की कोमलता को लेकर प्रभु आराधना को अपना विषय बनाया जाता था। कालांतर में इसकी लोकप्रिता बढ़ी और यह अंग्रेजी में अनुवादित की गयी। भारत में सर्वप्रथम इसका प्रयोग रविन्द्र नाथ टैगोर ने किया इसके बाद अज्ञेय ने अपने ‘तार सप्तक’ में भी हाईकूनुमा काव्य को उल्लिखित किया। दिल्ली विश्विद्यालय के जापानी विभाग के प्रमुख प्रो. वर्मा ने इस पर काम किया और भारतीय कवियों को जापानी व्याकरण से परिचित कराया जिसके परिणाम स्वरूप डा. भगवत शरण अग्रवाल व डा. चुघ ने भी इस विधा पर काम किया। धीरे-धीरे यह विधा लोकप्रिय हो गयी और हिन्दी के अतिरिक्त मराठी,पंजाबी, गुजराती,तेलुगु,तमिल,उड़िया व वांग्ला में लोकप्रि हुई। इसका लघु आकार एवं क्षणिका रूप ही नये कवियों के लिए आर्कषण का विषय बना।1994-95 के दौरान आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद से विन्दु जी महराज के हाईकू कविताओं का प्रकाशन हुआ जिससे प्रेरित होकर तमाम नये हिंदी कवियों ने इसमें रचनाएं करनी शुरू कर दीं। कविताओं के विकास के लिए बिन्दू जी महराज ने हैदराबाद में ‘श्री चन्द्र कविता महाविद्यालय एवं शोध संस्थान ’ की स्थापना नबोधा साहित्यकारों को हिन्दी हाईकू व अन्य काव्य विधाओं से परिचित कराने के लिए की। हिंदुस्तान में लिखित हाईकू ‘पांच-पांच-सात’ वर्ण में लिखी जाती थी जबकि जापान में इसे ‘पांच-सात-पांच’ वर्ण में लिखा जाने लगा। हिंदी हाईकू काव्य का एक उदाहराण इस प्रकार है--------
‘ टूटा खिलौना
चोट लगी बच्चे के
अंतर में भी ’
इस विधा की खास बात यह है कि इसकी रचनाओं में अध्यात्म, प्रकृति और प्रवृत्ति का अद्भुत सम्मिश्रण होता है।