संसार को देख कर ही तुलसीदास ने कहा था.-- ''केशव कही न जात का कहिये अति बिचित्र रचना अनूप मनहि समझु मनही मन रहिए।।''ये बात दार्शनिक भले ही लगे लेकिन संसार को देखने के बाद ऐसा लगता है कि वास्तव में संसार अबूझ ही है और शायद इसलिए रामायण जैसे बड़े महाकाव्य के रचईता को भी संसार की माया समझने में उलझन हुई होगी तभी तो उनके मन से स्वतःस्फूर्त रूप से ऐसी उक्ति निःसृत हुई होगी। सबसे बड़ी मजेदार बात यह है की जिन महापुरूष के ग्रन्थ को पढ़ कर हम संसार में रहने का गुर सीखते हैं वो भी इस संसार की अबूझ पहेली में उलझ गए थे तभी तो उनके श्रीमुख से ऐसी चौपाई निकली होगी जो अभी भी उतनी ही समसामियक है जितनी की पहले थी...........