रविवार, 13 फ़रवरी 2011

ये साली जिंदगी...... !

इस शीर्षक से फिल्म बन जाने से लगता है कि यह फिल्म का ही शीर्षक है ,किन्तु वास्तविकता यह है कि यह आम आदमी के मुख से निकला देशी शब्द है। जिन्दगी की बानगी ही ऐसी है कि आदमी के मुख से बरबस यह शब्द निकल जाता है। मैं ब्लाग के द्वारा फिल्म की समीक्षा नहीं कर रहा हूँ क्योंकि यह फिल्म मैनें अभी नहीं देखी।जिन्दगी एक अनुत्तरित प्रश्न है जिसका उत्तर हर आदमी ढूँढ़ता है लेकिन दुर्भाग्यवश उसे मिलता नहीं है क्योंकि जिन्दगी है ही ऐसी अनोखी । करो कुछ होता है कुछ, कल्पना करो अच्छी हो जाता है बुरा, सोचो अच्छा हो जाय बुरा तो कोई भी जिन्दगी की तारीफ नहीं कर सकता। हर आदमी अपनी चालाकी से जिन्दगी को अच्छा और अच्छा करना चाहता है किंतु होता कहीं ठीक इसके उलट है क्योंकि हम हर काम प्लानिंग से करना चाहते हैं और जिंदगी को प्लानिंग कतई पसंद नहीं , जिन्दगी शर्मीली है और वह अपना रहस्य नहीं खोलना चाहती लेकिन आदमी तो वह जन्तु है जो आत्मा - परमात्मा को जानने के साथ-साथ जिन्दगी को भी जानने की जुगत में लगा रहता है। रही बात जिंदगी की तो वह समाजवादी है क्योंकि उसे ऊँच-नीच का भेद नहीं आता और सभी को समान रूप से मजा चखाती रहती है । जिंदादिल तो इसके खेल को समझ लेते हैं और उसी के साथ खेलने लगते हैं लेकिन बेचारे वे लोग जो इसके रहस्य को जान लेना चाहते हैं वो इससे आजिज आकर कह देते हैं कि ये साली जिंदगी भी क्या चीज है और जिंदगी भी कहीं न कहीं यही चाहती है कि उसे समझने का प्रयास न किया जाय तो आइए जिंदगी के रहस्य को जानने की बजाय उसे जीने में तत्परता दिखाई जाय नहीं तो जिंदगी रोज एक नया प्रश्न लायेगी और हम उत्तर खोजेंगे। इस लुकाछिपी के खेल को छोड़कर हमें जिन्दगी का मजा लेना चाहिए और उसे अपना सच्चा दोस्त मान लेना चाहिए.......

2 टिप्‍पणियां: