बुधवार, 4 दिसंबर 2024

संत समाज को आईना...................

 


भारत-भूमि प्रारम्भ से ही संतों की भूमि रही है। यह धरती कभी भी इन विभूतियों से खाली नहीं रही है। लेकिन जबसे भौतिकता की चका-चैंध ने पूरे विश्व को अपने दायरे में लिया है तबसे संत समाज में भी यह ऐसी भावना बलवती हो गयी है कि संपत्ति हासिल किए बिना किसी पंथ, संप्रदाय, संस्था, समाज, ट्रस्ट या धार्मिक भावना को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। समय-समय पर कुछ संतों ने उपरोक्त मत को पूरी तरह नकारा और यह बताने के चेष्ठा की कि बिना संपत्ति के भी आध्यात्मिक उन्नति संभव है। भौतिकता की चकाचौंध से लौकिक प्रगति और प्रचार-प्रसार को बढ़ावा तो दिया जा सकता है लेकिन जब बात आध्यामिक प्रगति की होती है तो इसमें भौतिक सामग्री किसी प्रकार की सहायता नहीं करती वरन यह कहीं न कहीं मायाजाल में उलझा देती है। वर्तमान समय में वृंदावन के लोकप्रिय संत प्रेमानंद जी ने कहीं न कहीं समाज में भौतिकता की चकाचैंध के लपेटे में आ चुके धर्माचार्यों को अप्रत्यक्ष रूप से यह नसीहत दे दी है कि यदि आध्यात्मिक उन्नति करनी है तो यह जरूरी नहीं है कि भौतिक साधनों का संग्रह करके ही उसे प्राप्त किया जाय। प्रेमानंद महराज की खास बात है कि दोनों किडनी के काम न करने के बाद भी उन्होंने ईश्वर का आश्रय ले रखा है और प्रवचन या भ्रमण आदि करते समय उस परम सत्ता की ऊर्जा से पूरी तरह लवरेज दिखायी देते हैं। उनकी ये गतिविधियां न केवल भक्तों के लिए बल्कि उन तथाकथित चिकित्सकों, वैज्ञानिकों और धर्माचार्यों के लिए भी अनुकरणीय हैं जो विज्ञान व ज्ञान मार्ग से ईश्वर की सत्ता को समझने व जानने का प्रयास करते रहते हैं। परम सत्ता के प्रति उनकी यह शरणागति और प्रियता का भाव पूरी तरह निरपेक्ष है जहां न कुछ पाने की चाहत है और न खोने की। यह इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर के सान्निध्य के लिए भौतिक साधनों की बजाय आत्मिक उन्नति और भक्ति मार्ग का आश्रय तथा नाम जप आवश्यक है। कोई माने या न माने  उपलब्धियां, सीद्धियां तथा संसाधन को इकट्ठा करना अलग बात है और आत्मिक प्रकाश के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर ईश्वर से एकाकार होने का भाव स्थापित करना अलग बात है।


गुरुवार, 21 नवंबर 2024

प्रज्ञावान तितली .............संस्मरण

 



एक तितली रंग-रोगन देखकर कमरे के अंदर उड़ते हुए आ गई ऐसा लगा मानो रंगों के आकर्षण के कारण वह खींची चली आयी हो। कमरे के अंदर मकड़ी ने जाला बना रखा था। उसने मौका मिलते ही तितली को धर दबोचा और वह स्वयं को उसकी पकड़ से न छुड़ा सकी। मेरी नजर कमरे के अंदर उड़ती हुयी तितली पर पड़ी जो अब उड़ने की बजाय वह पूरी तरह मकड़ी की गिरफ्त में आ चुकी थी। जैसे ही मैनें दीवार से लगी तितली को स्पर्श किया तितली बेजान सी नीचे गिर गयी। इस घटना को देखकर आश्चर्य हुआ कि आखिर हुआ क्या ? अचानक उड़ती हुई तितली मृतप्राय क्यों दिखने लगी ! समीप जाकर उसे देखने से ऐसा लगा कि मकड़ी ने तितली पर अपनी जबरदस्त पकड़ बना रखी थी, जिसके कारण वह उड़ने में असहाय महसूस करने लगी। तितली की यह दशा देखकर उसे मकड़ी से मुक्त कराने की इच्छा मुझमें बलवती होने लगी। इसके लिए एक तृण का सहारा लेकर मैने मकड़ी की पकड़ को कुछ कम किया ही था कि तितली को अपने बल का एहसास हुआ और उसने एक छोटी सी उड़ान भरी लगभग वह 100 मीटर तक गयी लेकिन इत्फाक से मकड़ी ने उसे पूरी तरह छोड़ा नहीं था। तितली पुनः लौटकर उसी स्थान पर आ पड़ी जहां से वह मकड़ी की पकड़ ढीली होने पर उड़ी थी। तितली के उड़ने पर मुझे भी यह एहसास हो गया था कि मकड़ी ने तितली को पूरी तरह नहीं छोड़ा था, लेकिन यह नहीं समझ सका था कि वह स्वयं को मकड़ी से मुक्त कराने के लिए पुनः उसी स्थान पर आ जायेगी। कुछ देर बाद वह तितली मकड़ी के साथ उसी स्थान पर उपस्थित हुई और अचेत होकर गिर पड़ी। फिर मैने तिनके के सहारे से तितली को मकड़ी से पूरी तरह विलग कर दिया। उसकी पकड़ से छूटते ही तितली हवा से बातें करने लगी। इस घटना के बाद एक प्रश्न जरूर माथे में कौंधने लगा कि क्या तितली को भी इसका ज्ञान रहता है कि उसे सहायता कहां से मिल सकती है। यद्यपित पूरी कहानी प्रकृति से हस्तक्षेप की लगती है लेकिन सुकून इस बात का रहा कि दोनों को विलग करने मेें मकड़ी और तितली दोनों सुरक्षित रहे और अल्प अवधि के लिए ही सही तितली को हवा में अपने पंख फड़फड़ाने के लिए सुरक्षित रखा जा सका।