एक तितली रंग-रोगन देखकर कमरे के अंदर उड़ते हुए आ गई ऐसा लगा मानो रंगों के आकर्षण के कारण वह खींची चली आयी हो। कमरे के अंदर मकड़ी ने जाला बना रखा था। उसने मौका मिलते ही तितली को धर दबोचा और वह स्वयं को उसकी पकड़ से न छुड़ा सकी। मेरी नजर कमरे के अंदर उड़ती हुयी तितली पर पड़ी जो अब उड़ने की बजाय वह पूरी तरह मकड़ी की गिरफ्त में आ चुकी थी। जैसे ही मैनें दीवार से लगी तितली को स्पर्श किया तितली बेजान सी नीचे गिर गयी। इस घटना को देखकर आश्चर्य हुआ कि आखिर हुआ क्या ? अचानक उड़ती हुई तितली मृतप्राय क्यों दिखने लगी ! समीप जाकर उसे देखने से ऐसा लगा कि मकड़ी ने तितली पर अपनी जबरदस्त पकड़ बना रखी थी, जिसके कारण वह उड़ने में असहाय महसूस करने लगी। तितली की यह दशा देखकर उसे मकड़ी से मुक्त कराने की इच्छा मुझमें बलवती होने लगी। इसके लिए एक तृण का सहारा लेकर मैने मकड़ी की पकड़ को कुछ कम किया ही था कि तितली को अपने बल का एहसास हुआ और उसने एक छोटी सी उड़ान भरी लगभग वह 100 मीटर तक गयी लेकिन इत्फाक से मकड़ी ने उसे पूरी तरह छोड़ा नहीं था। तितली पुनः लौटकर उसी स्थान पर आ पड़ी जहां से वह मकड़ी की पकड़ ढीली होने पर उड़ी थी। तितली के उड़ने पर मुझे भी यह एहसास हो गया था कि मकड़ी ने तितली को पूरी तरह नहीं छोड़ा था, लेकिन यह नहीं समझ सका था कि वह स्वयं को मकड़ी से मुक्त कराने के लिए पुनः उसी स्थान पर आ जायेगी। कुछ देर बाद वह तितली मकड़ी के साथ उसी स्थान पर उपस्थित हुई और अचेत होकर गिर पड़ी। फिर मैने तिनके के सहारे से तितली को मकड़ी से पूरी तरह विलग कर दिया। उसकी पकड़ से छूटते ही तितली हवा से बातें करने लगी। इस घटना के बाद एक प्रश्न जरूर माथे में कौंधने लगा कि क्या तितली को भी इसका ज्ञान रहता है कि उसे सहायता कहां से मिल सकती है। यद्यपित पूरी कहानी प्रकृति से हस्तक्षेप की लगती है लेकिन सुकून इस बात का रहा कि दोनों को विलग करने मेें मकड़ी और तितली दोनों सुरक्षित रहे और अल्प अवधि के लिए ही सही तितली को हवा में अपने पंख फड़फड़ाने के लिए सुरक्षित रखा जा सका।
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