भारत-भूमि प्रारम्भ से ही संतों की भूमि रही है। यह धरती कभी भी इन विभूतियों से खाली नहीं रही है। लेकिन जबसे भौतिकता की चका-चैंध ने पूरे विश्व को अपने दायरे में लिया है तबसे संत समाज में भी यह ऐसी भावना बलवती हो गयी है कि संपत्ति हासिल किए बिना किसी पंथ, संप्रदाय, संस्था, समाज, ट्रस्ट या धार्मिक भावना को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। समय-समय पर कुछ संतों ने उपरोक्त मत को पूरी तरह नकारा और यह बताने के चेष्ठा की कि बिना संपत्ति के भी आध्यात्मिक उन्नति संभव है। भौतिकता की चकाचौंध से लौकिक प्रगति और प्रचार-प्रसार को बढ़ावा तो दिया जा सकता है लेकिन जब बात आध्यामिक प्रगति की होती है तो इसमें भौतिक सामग्री किसी प्रकार की सहायता नहीं करती वरन यह कहीं न कहीं मायाजाल में उलझा देती है। वर्तमान समय में वृंदावन के लोकप्रिय संत प्रेमानंद जी ने कहीं न कहीं समाज में भौतिकता की चकाचैंध के लपेटे में आ चुके धर्माचार्यों को अप्रत्यक्ष रूप से यह नसीहत दे दी है कि यदि आध्यात्मिक उन्नति करनी है तो यह जरूरी नहीं है कि भौतिक साधनों का संग्रह करके ही उसे प्राप्त किया जाय। प्रेमानंद महराज की खास बात है कि दोनों किडनी के काम न करने के बाद भी उन्होंने ईश्वर का आश्रय ले रखा है और प्रवचन या भ्रमण आदि करते समय उस परम सत्ता की ऊर्जा से पूरी तरह लवरेज दिखायी देते हैं। उनकी ये गतिविधियां न केवल भक्तों के लिए बल्कि उन तथाकथित चिकित्सकों, वैज्ञानिकों और धर्माचार्यों के लिए भी अनुकरणीय हैं जो विज्ञान व ज्ञान मार्ग से ईश्वर की सत्ता को समझने व जानने का प्रयास करते रहते हैं। परम सत्ता के प्रति उनकी यह शरणागति और प्रियता का भाव पूरी तरह निरपेक्ष है जहां न कुछ पाने की चाहत है और न खोने की। यह इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर के सान्निध्य के लिए भौतिक साधनों की बजाय आत्मिक उन्नति और भक्ति मार्ग का आश्रय तथा नाम जप आवश्यक है। कोई माने या न माने उपलब्धियां, सीद्धियां तथा संसाधन को इकट्ठा करना अलग बात है और आत्मिक प्रकाश के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर ईश्वर से एकाकार होने का भाव स्थापित करना अलग बात है।
प्रवीण की बात...
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बुधवार, 4 दिसंबर 2024
संत समाज को आईना...................
गुरुवार, 21 नवंबर 2024
प्रज्ञावान तितली .............संस्मरण
एक तितली रंग-रोगन देखकर कमरे के अंदर उड़ते हुए आ गई ऐसा लगा मानो रंगों के आकर्षण के कारण वह खींची चली आयी हो। कमरे के अंदर मकड़ी ने जाला बना रखा था। उसने मौका मिलते ही तितली को धर दबोचा और वह स्वयं को उसकी पकड़ से न छुड़ा सकी। मेरी नजर कमरे के अंदर उड़ती हुयी तितली पर पड़ी जो अब उड़ने की बजाय वह पूरी तरह मकड़ी की गिरफ्त में आ चुकी थी। जैसे ही मैनें दीवार से लगी तितली को स्पर्श किया तितली बेजान सी नीचे गिर गयी। इस घटना को देखकर आश्चर्य हुआ कि आखिर हुआ क्या ? अचानक उड़ती हुई तितली मृतप्राय क्यों दिखने लगी ! समीप जाकर उसे देखने से ऐसा लगा कि मकड़ी ने तितली पर अपनी जबरदस्त पकड़ बना रखी थी, जिसके कारण वह उड़ने में असहाय महसूस करने लगी। तितली की यह दशा देखकर उसे मकड़ी से मुक्त कराने की इच्छा मुझमें बलवती होने लगी। इसके लिए एक तृण का सहारा लेकर मैने मकड़ी की पकड़ को कुछ कम किया ही था कि तितली को अपने बल का एहसास हुआ और उसने एक छोटी सी उड़ान भरी लगभग वह 100 मीटर तक गयी लेकिन इत्फाक से मकड़ी ने उसे पूरी तरह छोड़ा नहीं था। तितली पुनः लौटकर उसी स्थान पर आ पड़ी जहां से वह मकड़ी की पकड़ ढीली होने पर उड़ी थी। तितली के उड़ने पर मुझे भी यह एहसास हो गया था कि मकड़ी ने तितली को पूरी तरह नहीं छोड़ा था, लेकिन यह नहीं समझ सका था कि वह स्वयं को मकड़ी से मुक्त कराने के लिए पुनः उसी स्थान पर आ जायेगी। कुछ देर बाद वह तितली मकड़ी के साथ उसी स्थान पर उपस्थित हुई और अचेत होकर गिर पड़ी। फिर मैने तिनके के सहारे से तितली को मकड़ी से पूरी तरह विलग कर दिया। उसकी पकड़ से छूटते ही तितली हवा से बातें करने लगी। इस घटना के बाद एक प्रश्न जरूर माथे में कौंधने लगा कि क्या तितली को भी इसका ज्ञान रहता है कि उसे सहायता कहां से मिल सकती है। यद्यपित पूरी कहानी प्रकृति से हस्तक्षेप की लगती है लेकिन सुकून इस बात का रहा कि दोनों को विलग करने मेें मकड़ी और तितली दोनों सुरक्षित रहे और अल्प अवधि के लिए ही सही तितली को हवा में अपने पंख फड़फड़ाने के लिए सुरक्षित रखा जा सका।
सोमवार, 14 अगस्त 2017
वाह रे लोकतंत्र ~~~~~~

गोरखपुर में हाल की घटना न केवल लोकतंत्र को शम॔सार करने वाली है वरन लोकतंत्र के प्रतिनिधियों को आइना भी दिखाती है । कहां इस मुद्दे पर सभी दलों को गंभीर होना चाहिए वहीं सभी दल दोषारोपण से काम चलाना चाहते हैं जो की सरासर बेमानी है । कम से कम बच्चों के शवों पर सियासत बन्द होनी चाहिए और दोषियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए। जनता के तंत्र में जनता की नाफरमानी किसी भी सियासी दल को भारी पड़ सकती है चाहे उसकी सरकार कितने ही प्रचण्ड बहुमत से क्यूं न बनी हो। जैसा कि यूपी के पूव॔वत्ती चुनावों में देखा भी गया है।
गुरुवार, 13 अगस्त 2015
केशव कही न जात का कहिये …………
संसार को देख कर ही तुलसीदास ने कहा था.-- ''केशव कही न जात का कहिये अति बिचित्र रचना अनूप मनहि समझु मनही मन रहिए।।''ये बात दार्शनिक भले ही लगे लेकिन संसार को देखने के बाद ऐसा लगता है कि वास्तव में संसार अबूझ ही है और शायद इसलिए रामायण जैसे बड़े महाकाव्य के रचईता को भी संसार की माया समझने में उलझन हुई होगी तभी तो उनके मन से स्वतःस्फूर्त रूप से ऐसी उक्ति निःसृत हुई होगी। सबसे बड़ी मजेदार बात यह है की जिन महापुरूष के ग्रन्थ को पढ़ कर हम संसार में रहने का गुर सीखते हैं वो भी इस संसार की अबूझ पहेली में उलझ गए थे तभी तो उनके श्रीमुख से ऐसी चौपाई निकली होगी जो अभी भी उतनी ही समसामियक है जितनी की पहले थी...........
रविवार, 17 फ़रवरी 2013
‘हाईकू’ जैसी काव्य विधा के मर्मज्ञ भी हैं बाबा
कुंभनगर। यदि आपको लगता है कि महाकुंभ में देश के सुदूर क्षेत्रों से आने वाले महात्मा केवल महाकाव्यों व वैदिक परंपराओं के मर्मज्ञ हैं,तो कहीं न कहीं आपकी जानकारी अधूरी है । संगम की रेती में देश भर से आने वाली विभूतियों में ‘डा. बिन्दु जी महराज ‘‘बिन्दू’’’ ऐसे महात्मा हैं जिन्हें विविध भाषाओं के साथ ही काव्य की जापनी विधा ‘हाईकू’ भी आती है। बिन्दु जी महराज द्वारा इस विधा को अपने राज्य आन्ध्र में लोकप्रिय बनाकर ‘हिन्दू हाईकूकारों’ की एक नयी पौध तैयार कर दी गयी है जो नित नयी रचनाओं को रच कर लुप्त हुई परंपरा को पुर्नजीवित करने का कार्य कर रहे हैं।
प्राचीन भारत में काव्य की यह विधा ‘समानिका ‘छंद’ के रूप में संग्रहित थी लेकिन आक्रमणों के साथ ही यह परंपरा विदेश से आने वाले फाह्यान व ह्वेनसांग जैसे बौद्ध भिक्षुओं द्वारा ले जाये गये साहित्य के साथ विदेशों में चली गयी और भारत से विलुप्तप्राय हो गयी। काव्य की यह विधा किसी प्रकार से जापान पहुंच गयी जहां कवि ‘झेन’ ने इस विधा का नाम जापानी में ‘ हाईकू’ कर दिया। जापान में हाईकू को ‘वन ब्रीथ पोयम’(एक स्वांसी काव्य) कहा गया। इस विधा में प्रकृति की कोमलता को लेकर प्रभु आराधना को अपना विषय बनाया जाता था। कालांतर में इसकी लोकप्रिता बढ़ी और यह अंग्रेजी में अनुवादित की गयी। भारत में सर्वप्रथम इसका प्रयोग रविन्द्र नाथ टैगोर ने किया इसके बाद अज्ञेय ने अपने ‘तार सप्तक’ में भी हाईकूनुमा काव्य को उल्लिखित किया। दिल्ली विश्विद्यालय के जापानी विभाग के प्रमुख प्रो. वर्मा ने इस पर काम किया और भारतीय कवियों को जापानी व्याकरण से परिचित कराया जिसके परिणाम स्वरूप डा. भगवत शरण अग्रवाल व डा. चुघ ने भी इस विधा पर काम किया। धीरे-धीरे यह विधा लोकप्रिय हो गयी और हिन्दी के अतिरिक्त मराठी,पंजाबी, गुजराती,तेलुगु,तमिल,उड़िया व वांग्ला में लोकप्रि हुई। इसका लघु आकार एवं क्षणिका रूप ही नये कवियों के लिए आर्कषण का विषय बना।1994-95 के दौरान आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद से विन्दु जी महराज के हाईकू कविताओं का प्रकाशन हुआ जिससे प्रेरित होकर तमाम नये हिंदी कवियों ने इसमें रचनाएं करनी शुरू कर दीं। कविताओं के विकास के लिए बिन्दू जी महराज ने हैदराबाद में ‘श्री चन्द्र कविता महाविद्यालय एवं शोध संस्थान ’ की स्थापना नबोधा साहित्यकारों को हिन्दी हाईकू व अन्य काव्य विधाओं से परिचित कराने के लिए की। हिंदुस्तान में लिखित हाईकू ‘पांच-पांच-सात’ वर्ण में लिखी जाती थी जबकि जापान में इसे ‘पांच-सात-पांच’ वर्ण में लिखा जाने लगा। हिंदी हाईकू काव्य का एक उदाहराण इस प्रकार है--------
‘ टूटा खिलौना
चोट लगी बच्चे के
अंतर में भी ’
इस विधा की खास बात यह है कि इसकी रचनाओं में अध्यात्म, प्रकृति और प्रवृत्ति का अद्भुत सम्मिश्रण होता है।
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