रविवार, 13 फ़रवरी 2011

सृजन में परमात्मा

आज मैनें ब्लाग बनाना सीखा, सीखना जीवन की एक सतत प्रक्रिया का नाम है। जब तक आदमी सीखता है तब तक बह उम्रदराज नहीं होता क्योंकि सीखने की यह प्रक्रिया उसे कहीं न कहीं सदैव ऊर्जावान बनाये रखती है। अगर हमें जीवन में जीवंतता को बनाये रखना है तो हमें सीखने की प्रक्रिया को सदैव जारी रखना होगा। सीखने वाले सदैव सीखने की जुगत में लगे रहते हैं क्योंकि सीखना उनके जीवन की प्रक्रिया का अंग बन जाता है। वास्तव में सृजन एक आनंतरिक प्रक्रिया का नाम है और जब हम सीखते हैं तो कहीं कहीं न कहीं उस सृजन को ही अपरोक्ष रूप से बढ़ावा दे रहे होते हैं। परमात्मा भी इस सृष्टि का सृजन करता है और जब हम भी इस सृष्टि में कुछ रच रहे होते हैं या कुछ सीख रहें होते हैं तो अनजाने में ही परमात्मा हमारे साथ होता है क्योंकि वह सृजनकर्ता है और सृजन करने वाले में उसका प्रकटीकरण स्वाभाविक ही हो जाता है। संक्षेप में कहें तो रचना के समय हम स्वयं परमात्मा हो जाते हैं क्योंकि इस समय हमारे अन्दर परमात्मा की प्रतिछाया प्रकट हो जाती है। यह कोई जरूरी नहीं कि जब हम कोई बड़ा ग्रंथ लिख रहें हों तो ही परमात्मा हमारे साथ हो, वह तो उस छोटे बच्चे के साथ भी हो सकता है जो अपनी तन्मयता के साथ उस रेत के घर का सृजन बिना किसी तर्क व स्वार्थ के कर रहा होता है जो कुछ ही देर में रेत में मिल जाने के लिए बना होता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें