कहना न होगा कि शीर्षक अजीब सा लग रहा है किंतु ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, क्योंकि इस शीर्षक के अंतर्गत हम रसों के राजा की बात करने जा रहे हैं। आप कहेंगे कि इक्जाम में तो नौ ही रस याद किए यह दसवां कहां से आ टपका। महोदय मैं आपको कतई भटका नहीं रहा हूँ क्योंकि दसवें रस को तो हम पढ़ते नहीं है ,किंतु सुबह से शाम तक में इसका पाला जरूर पड़ जाता है और न चाहते हुए भी कहीं न कहीं हम इसकी चपेट में आ ही जाते हैं। इस दसवें रस का नाम ही निंदा रस है जिसका रसास्वादन हम समय समय से करते रहते हैं। इस रस का आनंद लेने के लिए किसी बड़े आयोजन की जरूरत भी नहीं होती है क्योंकि जहां दो तीन मित्र इकट्ठा हुए वहीं यह रस अपने आप बहने लगता है और सामग्री भी अपने आप आने लगती है। तुर्रा यह कि इसका मजा लेने से कोई चूकना भी नहीं चाहता और चाहे भी क्यों । सभी अपनी भड़ास इसी के माध्यम से निकाल लेना चाहते हैं क्योंकि यदि ऐसा नहीं किया तो भोजन न पचने के साथ-साथ डिप्रेशन जैसी घातक बीमारियों के आने का खतरा बना रहता है। कई लोगों को तो इस रस में डूबे रहना इतना अच्छा लगता है कि इसके चक्कर में वे अपने महत्वपूर्ण कार्य भी भूल जाते हैं। पुरूष व महिलाएं दोनों इसका भरपूर मजा लेते हैं और लें भी क्यों नहीं मुफ्त व अनलिमिटेड जो है। दसवें रस के चक्कर में बेचारे नौ रस पिटते हैं जिनको हम बचपन से याद करते आ रहे हैं। जो अपने को इस रस से बचते हुए दिखाते हैं वे कहते हैं कै कि हम तो किसी के बारे में कुछ कहना नहीं चाहते लेकिन क्या करें....सही बात है इस दसवें रस से बचना बड़ा मुश्किल है और यह हमारे लिए चुनौती भी है कि इससे कैसे बचें ।कुलमिलाकर सकारात्मक रूप से तो हमें इस रस का प्रयोग करना ही होगा क्योंकि इससे बचने पर हम बोझिल हो सकते हैं .....आपका क्या बिचार है...
साहित्य,कला,अध्यात्म, धर्म, आयुर्वेद ,समसामयिक चर्चा, रेसिपी, यात्रा वृतांत,संस्मरण, फिल्म, समीक्षा......आदि.....
मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011
रविवार, 13 फ़रवरी 2011
ये साली जिंदगी...... !
इस शीर्षक से फिल्म बन जाने से लगता है कि यह फिल्म का ही शीर्षक है ,किन्तु वास्तविकता यह है कि यह आम आदमी के मुख से निकला देशी शब्द है। जिन्दगी की बानगी ही ऐसी है कि आदमी के मुख से बरबस यह शब्द निकल जाता है। मैं ब्लाग के द्वारा फिल्म की समीक्षा नहीं कर रहा हूँ क्योंकि यह फिल्म मैनें अभी नहीं देखी।जिन्दगी एक अनुत्तरित प्रश्न है जिसका उत्तर हर आदमी ढूँढ़ता है लेकिन दुर्भाग्यवश उसे मिलता नहीं है क्योंकि जिन्दगी है ही ऐसी अनोखी । करो कुछ होता है कुछ, कल्पना करो अच्छी हो जाता है बुरा, सोचो अच्छा हो जाय बुरा तो कोई भी जिन्दगी की तारीफ नहीं कर सकता। हर आदमी अपनी चालाकी से जिन्दगी को अच्छा और अच्छा करना चाहता है किंतु होता कहीं ठीक इसके उलट है क्योंकि हम हर काम प्लानिंग से करना चाहते हैं और जिंदगी को प्लानिंग कतई पसंद नहीं , जिन्दगी शर्मीली है और वह अपना रहस्य नहीं खोलना चाहती लेकिन आदमी तो वह जन्तु है जो आत्मा - परमात्मा को जानने के साथ-साथ जिन्दगी को भी जानने की जुगत में लगा रहता है। रही बात जिंदगी की तो वह समाजवादी है क्योंकि उसे ऊँच-नीच का भेद नहीं आता और सभी को समान रूप से मजा चखाती रहती है । जिंदादिल तो इसके खेल को समझ लेते हैं और उसी के साथ खेलने लगते हैं लेकिन बेचारे वे लोग जो इसके रहस्य को जान लेना चाहते हैं वो इससे आजिज आकर कह देते हैं कि ये साली जिंदगी भी क्या चीज है और जिंदगी भी कहीं न कहीं यही चाहती है कि उसे समझने का प्रयास न किया जाय तो आइए जिंदगी के रहस्य को जानने की बजाय उसे जीने में तत्परता दिखाई जाय नहीं तो जिंदगी रोज एक नया प्रश्न लायेगी और हम उत्तर खोजेंगे। इस लुकाछिपी के खेल को छोड़कर हमें जिन्दगी का मजा लेना चाहिए और उसे अपना सच्चा दोस्त मान लेना चाहिए.......
सृजन में परमात्मा
आज मैनें ब्लाग बनाना सीखा, सीखना जीवन की एक सतत प्रक्रिया का नाम है। जब तक आदमी सीखता है तब तक बह उम्रदराज नहीं होता क्योंकि सीखने की यह प्रक्रिया उसे कहीं न कहीं सदैव ऊर्जावान बनाये रखती है। अगर हमें जीवन में जीवंतता को बनाये रखना है तो हमें सीखने की प्रक्रिया को सदैव जारी रखना होगा। सीखने वाले सदैव सीखने की जुगत में लगे रहते हैं क्योंकि सीखना उनके जीवन की प्रक्रिया का अंग बन जाता है। वास्तव में सृजन एक आनंतरिक प्रक्रिया का नाम है और जब हम सीखते हैं तो कहीं कहीं न कहीं उस सृजन को ही अपरोक्ष रूप से बढ़ावा दे रहे होते हैं। परमात्मा भी इस सृष्टि का सृजन करता है और जब हम भी इस सृष्टि में कुछ रच रहे होते हैं या कुछ सीख रहें होते हैं तो अनजाने में ही परमात्मा हमारे साथ होता है क्योंकि वह सृजनकर्ता है और सृजन करने वाले में उसका प्रकटीकरण स्वाभाविक ही हो जाता है। संक्षेप में कहें तो रचना के समय हम स्वयं परमात्मा हो जाते हैं क्योंकि इस समय हमारे अन्दर परमात्मा की प्रतिछाया प्रकट हो जाती है। यह कोई जरूरी नहीं कि जब हम कोई बड़ा ग्रंथ लिख रहें हों तो ही परमात्मा हमारे साथ हो, वह तो उस छोटे बच्चे के साथ भी हो सकता है जो अपनी तन्मयता के साथ उस रेत के घर का सृजन बिना किसी तर्क व स्वार्थ के कर रहा होता है जो कुछ ही देर में रेत में मिल जाने के लिए बना होता है।
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